कलेक्टर साहिबा की सबसे बड़ी खूबी है - फैसले लेने की क्षमता। बाढ़, सूखा, कानून-व्यवस्था या विकास कार्य, वह हर मोर्चे पर पुरुष सहयोगियों को टक्कर देती हैं। लेकिन साथ ही, उनमें एक मां और बेटी वाली संवेदनशीलता भी होती है।
यहाँ ब्लॉग पोस्ट "कलेक्टर साहिबा" (महिला जिलाधिकारी) के विषय में हिंदी में प्रस्तुत है: collector sahiba in hindi
जय हिंद, और सलाम है ऐसी 'कलेक्टर साहिबा' को जो हर चुनौती को मात देकर दिखा रही हैं! तो मन में एक सख्त
आज के दौर में जब हम 'कलेक्टर' शब्द सुनते हैं, तो मन में एक सख्त, दबंग और अक्सर पुरुष चेहरे की छवि उभरती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह तस्वीर तेजी से बदली है। अब जिले की कमान ‘कलेक्टर साहिबा’ के हाथों में भी है। आज के इस ब्लॉग में बात करेंगे एक ऐसी ही कलेक्टर साहिबा की, जो न सिर्फ कुर्सी की गरिमा बढ़ाती हैं, बल्कि हर उस स्टीरियोटाइप को तोड़ती हैं, जो समाज ने बना रखा है। आप तो औरत हो
यह रास्ता फूलों की सेज नहीं है। अक्सर पुरुष अधिकारियों को किसी महिला से ऑर्डर लेना मुश्किल लगता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार तो सीधा सवाल आता है - "मैडम, आप तो औरत हो, आप कैसे सुनिश्चित करोगी कि गुंडे दबे रहें?" ऐसे में कलेक्टर साहिबा अपनी मुस्कान के साथ जवाब देती हैं - "गुंडे जेंडर नहीं देखते, लेकिन पुलिस बुलाते वक्त ज़रूर देखते हैं कि किसकी ताकत उनके ऊपर है।"
जब कोई दलित महिला शोषण की शिकायत लेकर पहुंचती है, तो कलेक्टर साहिबा उसकी बात धैर्य से सुनती हैं। आंखों में उतनी ही नमी होती है, जितनी सख्ती फाइलों के निर्णय में। वह जानती हैं कि कानून सबके लिए समान है, लेकिन उसे लागू करने के लिए कभी-कभी हृदय से भी सोचना पड़ता है।
दफ्तर में जब वह प्रवेश करती हैं, तो उनके आत्मविश्वास से हवा भारी हो जाती है। सफेद शर्ट, स्लेटी साड़ी और हाथ में फ़ाइल। न तो अति आडंबर, न ही असुरक्षा। कलेक्टर साहिबा अपने फैसलों के लिए जानी जाती हैं। उन्हें 'मैडम' कहलवाना पसंद नहीं, बल्कि अधिकार और जिम्मेदारी के लिए वह 'साहिबा' का दर्जा चाहती हैं। और यह दर्जा वह कामयाबी से हासिल भी करती हैं।